गौलापार हादसा: जान बचाने उतरा, खुद भी मौत के मुंह तक पहुंच गया – सब्जी विक्रेता की आपबीती
“मंगलवार रात मैं रोज की तरह सब्जी बेचकर घर लौट रहा था। सब कुछ सामान्य था, लेकिन मानपुर पहुंचते ही एक महिला की चीख सुनाई दी। वह लगातार चिल्ला रही थी—‘बचाओ… बचाओ… लोग टैंक में गिर गए हैं।’
मैं बिना एक पल गंवाए मौके पर पहुंचा। टैंक के अंदर झांककर देखा तो कोई आवाज या हलचल नहीं थी। मैंने हिम्मत जुटाई और सीधे टैंक के भीतर उतर गया।
अंदर करीब आधा फीट पानी भरा हुआ था। वहां मेरी मां और दोनों बेटों के सिर उसी पानी में डूबे हुए थे। तीनों बेहोश पड़े थे। मैंने तुरंत उनके सिर ऊपर किए ताकि उन्हें सांस मिल सके।
लेकिन टैंक के अंदर जहरीली गैस और असहनीय बदबू फैली हुई थी। हवा इतनी भारी थी कि सांस लेना मुश्किल हो रहा था। इसके बावजूद मैं एक-एक कर तीनों को बाहर निकालने की कोशिश करता रहा।
कुछ ही देर में मेरा भी दम घुटने लगा। आंखों के आगे अंधेरा छा गया और शरीर ने जवाब दे दिया। इसके बाद मुझे कुछ याद नहीं कि क्या हुआ और कब मैं बेहोश होकर गिर पड़ा।
बाद में पता चला कि ग्रामीणों ने टैंक का ढक्कन तोड़ा, जिससे अंदर हवा पहुंची और मेरी सांसें लौट सकीं। फिर उन्होंने रस्सी के सहारे मुझे किसी तरह बाहर निकाला। अगर ग्रामीण समय पर मदद नहीं करते, तो शायद मैं भी जिंदा बाहर नहीं निकल पाता।
ग्रामीणों ने बताया कि टैंक का प्रवेश द्वार केवल एक से डेढ़ फुट चौड़ा था, जिससे लोगों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल था। मजबूरन टैंक को दूसरी तरफ से तोड़कर रास्ता बनाया गया। हालांकि, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और तीन लोगों की दर्दनाक मौत हो चुकी थी।”

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