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पहाड़ों में निर्मल, मैदान में बदला पानी का हाल: यमुना-टोंस की गुणवत्ता पर रिपोर्ट

पहाड़ों में निर्मल, मैदान में बदला पानी का हाल: यमुना-टोंस की गुणवत्ता पर रिपोर्ट

पहाड़ों से निकलने वाली यमुना और टोंस नदी का पानी अभी भी अपनी स्वच्छता के लिए पहचान बनाए हुए है। लेकिन जैसे ही ये नदियां मैदान की ओर बढ़ती हैं, इनकी जल गुणवत्ता में गिरावट दर्ज होने लगती है। उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2026 की ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पीने योग्य पानी मैदान में पहुंचते-पहुंचते केवल स्नान योग्य रह जाता है।

उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की सतह जल गुणवत्ता रिपोर्ट के मुताबिक, लखवाड़ तक यमुना और टोंस नदी का पानी ए-ग्रेड यानी आचमन योग्य पाया गया है। हिमाचल प्रदेश से आने वाली टोंस नदी का जल भी डाकपत्थर में यमुना से मिलने से पहले तक पूरी तरह पीने योग्य श्रेणी में दर्ज किया गया है।

हालांकि, डाकपत्थर में दोनों नदियों के संगम के बाद स्थिति बदलने लगती है। डाकपत्थर, कालसी और विकासनगर तक पहुंचते-पहुंचते पानी की गुणवत्ता बी-ग्रेड में दर्ज की गई है, जिसका अर्थ है कि यह पानी स्नान के लिए तो उपयुक्त है, लेकिन सीधे पीने योग्य नहीं माना जाता।

विशेषज्ञों के अनुसार, मैदानों में बढ़ती आबादी, बिना शोधन के बहाया जा रहा सीवेज, घरेलू अपशिष्ट, कृषि गतिविधियां और अन्य प्रदूषण स्रोत जल गुणवत्ता को प्रभावित कर रहे हैं। यही वजह है कि नदियों का स्वच्छ पानी आगे बढ़ते हुए अपनी गुणवत्ता खोने लगता है।

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि नदियों में बिना शोधन के सीवेज और अन्य अपशिष्टों का प्रवाह नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। उनका कहना है कि जल स्रोतों का संरक्षण, प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन और नियमित निगरानी ही यमुना और टोंस जैसी नदियों की स्वच्छता बनाए रखने का सबसे प्रभावी उपाय है।

पहाड़ों से मिलने वाला निर्मल जल हमारी अमूल्य धरोहर है। इसे स्वच्छ बनाए रखना केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की साझा जिम्मेदारी है।