पत्रकारों ने देखा 1971 युद्ध का गवाह INS कुरसुरा, समुद्र के नीचे की वीरगाथा
देहरादून, 10 फ़रवरी (हि.स.)। उत्तराखंड के पत्रकारों के विशेष अध्ययन-सह-भ्रमण के पहले दिन की शुरुआत ऐतिहासिक और गौरवशाली रही। प्रतिनिधिमंडल ने विशाखापत्तनम पहुंचते ही 1971 के भारत–पाक युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाली ऐतिहासिक पनडुब्बी आईएनएस कुरसुरा (एस20) का भ्रमण किया। यह वही युद्धपोत है जिसने बंगाल की खाड़ी में सक्रिय रहते हुए पाकिस्तानी नौसेना के खिलाफ निर्णायक अभियानों में हिस्सा लिया और दुश्मन के दाँत खट्टे कर दिए थे।
नव सेना के आडनरी सब लेफ्टिनेंट अनिल करने चौधरी ने पत्रकारों को पनडुब्बी के भीतर ले जाकर इसके विभिन्न हिस्सों की जानकारी दी। गाइड एवं सेवानिवृत्त नौसैनिक अनिल ने इसके संचालन, रणनीति और तकनीकी क्षमताओं के बारे में विस्तार से बताया। भ्रमण के दौरान पत्रकारों ने टॉरपीडो कक्ष, कमांड रूम, क्रू क्वार्टर, इंजन रूम देखा।
उन्बहोंने ताया कि 1971 के युद्ध के दौरान कुरसुरा ने बंगाल की खाड़ी में गुप्त रूप से गश्त लगाते हुए पाकिस्तानी नौसैनिक गतिविधियों पर कड़ी नजर रखी और कई रणनीतिक अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पनडुब्बी से संग्रहालय तक का सफ़र करीब तीन दशकों तक भारतीय नौसेना की सेवा करने के बाद 1999 में आईएनएस कुरसुरा को सेवा से मुक्त कर दिया गया। 2001 में इसे विशाखापत्तनम के रामकृष्णा बीच पर संग्रहालय के रूप में स्थापित किया गया। आज यह देश की सैन्य धरोहर का प्रतीक बन चुकी है और विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं व आम नागरिकों के लिए प्रेरणा का केंद्र है।
भ्रमण के बाद पत्रकार प्रतिनिधिमंडल ने इसे अत्यंत ज्ञानवर्धक और रोमांचक अनुभव बताया। वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि इस तरह के दौरे देश की सैन्य ताकत और इतिहास को समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
निदेशक संजीव सुंदरियाल ने बताया कि अगले दिनों में वे विशाखापत्तनम और आसपास के अन्य ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक स्थलों का दौरा करेंगे और अपने अनुभव उत्तराखंड के पाठकों तक पहुंचाएंगे।

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